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अहमदाबाद। आज नवपद जी की  आराधना का पांचवा दिन साधु द की आराधना का दिन है। नवाकार के नवपद है एक ओर शुरूआत के चार पद तो दूसरी ओर पीछे चार पद इन दोनों के बीच में यदि कोई पद आता है तो वह है साधु पद। शास्त्रकार महर्षि नवपदों को नवरत्नों के हार की कल्पना करके फरमाते है दोनों तरफ चार चार रत्नों है। इन चार चार रत्नों के बीच में महामूल्यवान ऐसा साधु पद है। कहते है साधु का वर्णन सुनकर आत्मा अन्य बनती है। उनका सिर फूट जाता है।
अहमदाबाद में बिराजित प्रखर प्रवचनकार, संत मनीषि, गच्छाधिपति प.पू.आ.देव राजयश सूरीश्वरजी महाराजा श्रोताजनों को संबोधित करते हुए फरमाते हैं कि साधूनां दर्शनं पुण्यं साधुओं के दर्शन से पुण्य की प्राप्ति होती है। एक गांव से दूसरे गांव जब हम विहार करके जाता है तब कितने अनजान व्यक्ति हमें हाथ जोड़ते है तो कोई हमारे पैर का स्पर्श भी करते है तो कितने साष्टांग नमस्कार भी करने है। उन लोगों का कहना है इस भौतिक जमाने में आप किस प्रकार खुल्ले पैर चलते हो?
पूज्यश्री फरमाते हंै कि कितने महान शक्तिशाली साधु दोपहर की कड़ी धूप में भी खुल्ले पैर चलते हैं। इस तरह की सुन्दर क्रिया को देखकर ही लोगों का सिर साधुओं के आगे झुक जाता है। साधु भगवंत जो सफेद वस्त्र धारण करते है वह सफेद रंग आंख को ठंडक देता है। साथ ही श्वेत रंग से आत्मा भी प्रसन्न जो अध्यात्म की मस्ती में रहता है उन्हें शुक्ल ध्यान एवं शुक्ल लेश्या होती है।
राष्ट्र ध्वज पचरंगा है मगर इन पचरंग के बीच में ही श्वेत रंग है। श्वेत रंग साधना का सूचक है हमें हमारे देश को, विश्व को तथा जीन को भी श्वेत बनाना है यानि उज्जवल बनाना है। शास्त्र के मुताबिक साधु के 27 गुण है साधु के प्रतिनिधित्व के रूप में काले रंग की कल्पना करने में आई है काले रंग के उड़द में बाहर का धर काला है तथा अंदर सफेद है।
दुनिया के अंधकार में उजाले को फैलाना जिनका स्वभाव है वह साधु भगवंतों का है। साधु भगवंत हमेशा दूसरों के कल्याण की ही भावना रखते हंै।
पूज्यश्री फरमाते है परमात्मा के कहे मुताबिक हरेक के जीवन का लक्ष्य इस तरह बनाना कि मृत्यु के पहले साधु बनुं। पूर्व भव की आराधना होगी अईमुत्ता बाल उम्र में जब परमात्मा विचरते थे तब संयम पाया। उस समय 14000 साधुओं के बीच जब ये बाल मुनि अईमुत्ता चल रहे थे तब लोगों को ये देखकर आश्चर्य चकित हुआ तब परमात्मा ने फरमाया ये कोई जैसा तैसा हाल मुनि नहीं है इसमें भले बाल के लक्षण है मगर इस मुनि में पूर्व भव के संस्कार है जिनकी वजह से यह मुनि कर्मो का क्षय करके एक ही भव में मोक्ष को पाएंगें। शुद्ध चारित्री आत्मा तत्काले मोक्ष-तद्भवे मोक्ष में जानी है तद्भव मोक्ष न पाए तो पांच-सात अथवा तो आठ भव करके भी मोक्ष की प्राप्ति करती ही है। यशोविजयजी महाराजा साधुओं का वर्णन करते हुए बताते है बाहर से मस्तक मुंडन किया हुआ है लेकिन अंतर से कषायों से मुक्त बने हुए साधु जीवन की मस्ती में मस्त,हरके जीवों को क्षमा प्रदान करने काले साधु होते है। अपार क्षमा वाले साधुओं के अनेक दृष्टांत है। परमात्मा महावीर स्वयं क्षमा के अवतार थे चंड कौशिक सर्प ने डंक मारा तो परमात्मा ने कहा, बुज्झ! बुज्झ चंडकौशिक। उन्होंने अपराध करने वाले को क्षमा प्रदान किया है। पूज्यश्री फरमाते है किसी ने अपराध किया हो तो उसे समझाना चाहिए समझाकर उसे माफ कर देना चाहिए। आप भी किसी न किसी साधु के संपक में आए ही होंगे कितना भी लोभ दोंगे वे लोभाएगें नहीं, आप उन साधु की करोड रूपिये से गुरूपूजन भी कर ले वे एक पैसा भी उन पूजन में से नहीं मांगेंगे। उन्होंने तो कुटुम्ब कंचन एवं कामिनी का त्याग किया है। साधु तो क्षमा के अवतार है, नम्रता के अवतार है, संतोष के अवतार है। किसी भी साधु को अन्न पकाना अच्छा नहीं लगता। पेट के पूरण हेतु वे भिक्षा के लिए जाते हैं। भिक्षा में यदि कोई गृहस्थ उन्हें खूब आग्रह करके कहे भगवंत! ये स्वीट आप ग्रहण करो, कल के लिए काम आएगा। तब वे साधु कहते हैं कुक्खी संबलस्स मेरा पेट जितना ही पात्र है वे कल की चिन्ता करके आहार ज्यादा ग्रहण नहीं करते है।
अन्य धर्मके साधु भी संयम जीवन का पालन करते हैं, लेकिन जैन साधुओं के जीवन को देखकर वे खूब अनुमोदना करते हुए कहते हैं कि हमें भी आपके जैसे संयम जीवन पालन करना अच्छा लगता है। जैन साधु कभी किसी पर ममत्व नहीं करते ना ही द्वेष करते हैं। वे एक ही स्थान पर नहीं रहते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम् सारी पृथ्वी ही उनका कुटुम्ब है। बस, जो साधु आराधना कर रहे हैं, उनको वंदन-सत्कार एवं सन्मान करके शीघ्र आत्मा से परमात्मा बनें।